रिपोर्ट - गौहर खान
सिकंदरपुर। सिकंदरपुर की सरज़मीं से ताल्लुक़ रखने वाले मशहूर आलिम-ए-दीन, खानकाह-ए-रशीदिया के सज्जादा-नशीन और मदरसा दारुल उलूम सरकारे आसी के बानी (संस्थापक) हज़रत मौलाना सज्जाद रशीदी साहब का इंतिक़ाल दीनी, तालीमी और रूहानी हल्कों के लिए एक नाक़ाबिले-तलाफ़ी नुक़सान है।
मरहूम ने अपनी पूरी ज़िंदगी दीन की ख़िदमत, इल्म की अशाअत और नई नस्ल की तालीम-ओ-तरबियत के लिए वक्फ़ कर दी। उनकी अथक मेहनत और दूरअंदेशी से मदरसा दारुल उलूम सरकारे आसी आज इल्म का एक अहम मरकज़ बन चुका है, जहाँ से फ़ारिग़ होने वाले तलबा हिंदुस्तान ही नहीं बल्कि दुनिया के मुख़्तलिफ़ मुल्कों में दीन और तालीम की ख़िदमत अंजाम दे रहे हैं।
मौलाना सज्जाद रशीदी साहब खानकाह-ए-रशीदिया के दो अज़ीम बुज़ुर्गों के ख़लीफ़ा भी थे। उन्होंने मदरसे के साथ-साथ खानकाह की रूहानी रिवायतों को ज़िंदा रखने और समाज की इस्लाह के लिए पूरी ज़िंदगी ख़िदमत की। उनकी सादगी, इल्म, तक़वा और अख़्लाक़ ने उन्हें पूरे मुल्क में एक सम्मानित पहचान दिलाई।
मरहूम की नमाज़-ए-जनाज़ा में दूर-दराज़ इलाक़ों से आए उलेमा-ए-किराम, माशाइख़, तलबा, मुरीदीन और अकीदतमंदों समेत हज़ारों की तादाद में लोगों ने शिरकत की। नम आँखों और ग़मगीन फ़िज़ा के बीच उन्हें उनके आबाई वतन सिकंदरपुर स्थित दरगाह के क़ब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-ख़ाक कर दिया गया।



