बलिया के किकोढ़ा की गलियों से राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार तक, डॉ. इफ्तेखार खान ने बढ़ाया बलिया का मान

रिपोर्ट - गौहर खान 

सिकंदरपुर, बलिया। सिकंदरपुर तहसील क्षेत्र के छोटे से गांव किकोढ़ा से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने वाले डॉ. इफ्तेखार खान ने एक बार फिर बलिया का नाम गौरवान्वित किया है। शिक्षा और कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए उनका चयन राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार-2026 के लिए किया गया है। केंद्र सरकार की घोषित सूची में उत्तर प्रदेश से तीन शिक्षकों का चयन हुआ है, जिनमें राजकीय इंटर कॉलेज, बलिया के कला अध्यापक डॉ. इफ्तेखार खान भी शामिल हैं।
राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार देश के उत्कृष्ट शिक्षकों को उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए प्रदान किया जाता है। आधिकारिक राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार पोर्टल के अनुसार यह सम्मान 1958 में शुरू हुआ था और प्रत्येक वर्ष शिक्षक दिवस के अवसर पर प्रदान किया जाता है। वर्ष 2026 की प्रक्रिया में स्वतंत्र राष्ट्रीय जूरी द्वारा चयन किया गया है।
किकोढ़ा से शुरू हुआ सफर
स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार डॉ. इफ्तेखार खान की प्रारंभिक शिक्षा सिकंदरपुर के जूनियर हाईस्कूल से हुई। बचपन से ही उनमें चित्रकला के प्रति विशेष रुचि थी। उनके पुराने गुरुजनों और साथियों के अनुसार वह ब्लैकबोर्ड पर शिक्षकों की तस्वीरें और आकृतियां हूबहू उतारने का प्रयास किया करते थे। उनकी प्रतिभा को देखकर उस दौर में ही गुरुजनों ने उनके उज्ज्वल भविष्य की बात कही थी।
उनके परिवार का भी शिक्षा से गहरा संबंध रहा। उनके पिता स्वयं शिक्षक रहे और उन्होंने क्षेत्र के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने में योगदान दिया। इसी शैक्षिक वातावरण ने इफ्तेखार खान की प्रतिभा को दिशा दी और आगे चलकर उन्होंने शिक्षा के साथ-साथ चित्रकला को अपना प्रमुख कार्यक्षेत्र बनाया।
शिक्षक के साथ वरिष्ठ चित्रकार भी
डॉ. इफ्तेखार खान वर्तमान में राजकीय इंटर कॉलेज, बलिया में कला अध्यापक हैं और एक वरिष्ठ चित्रकार के रूप में भी अपनी पहचान बना चुके हैं। उनकी खासियत यह है कि उन्होंने चित्रकला को केवल व्यक्तिगत कला तक सीमित नहीं रखा, बल्कि बच्चों की प्रतिभा को निखारने का माध्यम बनाया।
वर्ष 2024 में राज्य ललित कला अकादमी उत्तर प्रदेश के सहयोग से टाउन इंटर कॉलेज में आयोजित 25 दिवसीय चित्रकला प्रशिक्षण कार्यशाला का निर्देशन उन्होंने किया। इसमें बच्चों को वाटर कलर, ऑयल कलर, एक्रेलिक और पेस्टल जैसे विभिन्न माध्यमों में चित्र बनाने का प्रशिक्षण दिया गया।
वर्ष 2025 में भी उनके निर्देशन में आयोजित ग्रीष्मकालीन चित्रकला कार्यशाला में बच्चों ने पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों पर चित्र बनाए। कार्यशाला में डॉ. खान ने बच्चों को लैंडस्केप पेंटिंग की तकनीक समझाने के साथ स्वयं चित्र बनाकर डेमोंस्ट्रेशन भी दिया।
कला के जरिए बलिया की पहचान को देश तक पहुंचाया
डॉ. इफ्तेखार खान की कला में बलिया के इतिहास और स्थानीय सरोकारों की झलक भी दिखाई देती है। वर्ष 2021 में उनकी बनाई ‘बलिया क्रांति 1942’ शीर्षक की ऑयल पेंटिंग राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी में उत्तर प्रदेश की ओर से प्रदर्शित हुई थी। इस राष्ट्रीय ऑनलाइन प्रदर्शनी में देश के विभिन्न हिस्सों के करीब 180 चित्रकारों की कलाकृतियां शामिल थीं।
उनकी इस पहल ने कला के माध्यम से बलिया के स्वतंत्रता आंदोलन और अगस्त क्रांति की स्मृतियों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम किया।
बच्चों की प्रतिभा को तराशने पर विशेष जोर
डॉ. खान की पहचान सिर्फ एक चित्रकार की नहीं, बल्कि बच्चों में छिपी कला प्रतिभा को मंच देने वाले शिक्षक की भी है। वर्ष 2024 की कला प्रदर्शनी में जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक ने बच्चों की कलाकृतियों की सराहना की थी और डॉ. इफ्तेखार खान के प्रयासों को प्रशंसनीय बताया था।
एक अन्य अवसर पर जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय की तत्कालीन कुलपति ने भी उनके निर्देशन में बच्चों द्वारा कला के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों की सराहना की थी। उनके निर्देशन में तैयार हुए बच्चों के कार्यों को विभिन्न स्तरों पर पहचान मिलने का उल्लेख भी किया गया।
राष्ट्रीय सम्मान से बढ़ा बलिया का गौरव
अब राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए उनका चयन इस पूरे सफर की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। उपलब्ध 2026 की सूची के अनुसार उत्तर प्रदेश से डॉ. रेनू त्रिपाठी, डॉ. इफ्तिखार खान और शालिनी कुशवाहा का चयन हुआ है।
डॉ. इफ्तेखार खान की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि यह केवल एक शिक्षक के राष्ट्रीय सम्मान की कहानी नहीं, बल्कि एक छोटे से गांव से निकली प्रतिभा के निरंतर संघर्ष, कला के प्रति समर्पण और बच्चों की प्रतिभा को आगे बढ़ाने की कहानी है।
किकोढ़ा से शुरू हुआ यह सफर आज राजकीय इंटर कॉलेज, बलिया से होते हुए राष्ट्रीय मंच तक पहुंच चुका है। गांव, सिकंदरपुर, बलिया और पूरे पूर्वांचल के लिए यह उपलब्धि निश्चित रूप से गर्व का विषय है।
एक छोटे से गांव का बेटा जब देश के उत्कृष्ट शिक्षकों की सूची में स्थान बनाता है, तो उसकी सफलता सिर्फ उसकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं रहती, वह पूरे गांव, जिले और क्षेत्र की उपलब्धि बन जाती है।
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